- गिरीश गुरुरानी
जमाने की बाते थीं
मालिक भी एक था, बादल भी एक थे।
बरसते मेघों से प्रकृति खिल उठती
आज तो दोस्तो,
कस्बे में, मोहल्ले में, चौराहे में
मालिक बैठते हैं
पानी बेचते हैं, कलेजा जल उठता।
हे मालिक, हे भगवन, हमारा नमन
तुम एक ही रहो,
दुनिया को मालिक न बनने दो
हमें आसरा दो, मालिकों से बचाओ।
बरसात तब भी थी, अब भी है
अन्तर इतना सा
कि सागर का पानी
पहले बरसता था, अब बिक रहा है
उफ! इसमें नशा भी है।




