चिपको आंदोलन की वर्षगांठ पर विशेष
-डा. अतुल शर्मा
पेड़ों का कटान लगातार हो रहा है, खेतों में इमारतें उग रही हैं। बेमौसम धुंध, धुएँ और कोहरे से घिर जाता है आकाश। खतरनाक प्रदूषण को रोकने के लिए अवैज्ञानिक विकास पर अंकुश लगना चाहिए। आओ, भोगवादी सभ्यता की जगह जल-संस्कृति और वन-संस्कृति की तरफ बढ़ें। अंतरिक्ष शांति, जीव-वनस्पति शांति और सर्वे भवन्तु सुखिनः की तरफ जाना ही एक मात्र रास्ता है। देर करना विनाश की ओर जाने के समान है। उत्तराखंड कितना सौभाग्यशाली है, जहां से महिलाओं ने करीब बावन साल पहले चिपको जैसे अद्भुत आंदोलन के जरिये सारे संसार को पर्यावरण संरक्षण की सीख दी, लेकिन दुर्भाग्य से हम पांच दशक बाद भी उस सीख पर अमल करने में कामयाब नहीं हो सके। कब समझेंगे और कब प्रकृति के बताए रास्ते पर लौटेंगे हम लोग? यह खतरनाक संसार हम किसके लिए सजा रहे हैं? सृष्टि को ही संकट में डालने की कोशिश किसलिए हो रही है?
आज का दिन मेरे लिए भी खास रहा है, चिपको आन्दोलन का वह दृश्य आंखों के सामने तैर गया। चिपको के गौरवपूर्ण आंदोलन के आप में से कुछ लोग भी साक्षी होंगे, कुछ लोगों ने वह कहानी पढ़ी और सुनी होगी। फिर भी यादें ताजा करना चाहता हूं। 26 मार्च 1974 को गौरा देवी गांव की सहेलियों को लेकर जंगल में पहुचीं। वहाँ 25000 देवदार के पेड़ काटने के लिये मजदूर आ गये थे। अंग्रेजी कानून था। जंगलों का अंधाधुंध कटान होता ही रहता था। गौरा देवी पहली महिला थीं, जो पेड़ों से चिपक गयीं बोलीं-पहले हमें काटो, फिर कुल्हाड़ा चलेगा हमारे मायके पर। हम मायका मानते हैं इस जंगल को। यहीं से चिपको आन्दोलन नाम पड़ा। लोक कवि घनश्याम शैलानी का गीत उस समय गाया गया। वही से चिपको नाम जुबान कर चढ़ गया। उस दिन गौरा देवी और साथियों पर बंदूक तानी गई, कुल्हाड़ी उठी पर ग्रामणों के साहस के सामने पेड़ की कटाई को उठाई कुल्हाड़ी बिना पेड़ों पर चले वापस ले जानी पड़ी। 52 साल पहले आज के दिन ही महिलाओं ने इतिहास रचा उत्तराखंड में और फिर दुनिया भर में यह संदेश फैला। समझ बनी कि ट्री माने टिंबर नहीं, मिट्टी, पानी और हवा होता है।
गोपेश्वर में पर्यावरणविद् चंडी प्रसाद भट्ट आगे आये। आन्दोलनकारी साथियों के साथ प्रसिद्ध पर्यावरणविद् सुन्दर लाल बहुगुणा ने जन-जन को इसके साथ जगह-जगह जोड़ा। राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में उनके लेख छपे। बाद में हमारी माताजी श्रीमती रमा शर्मा अपनी साथियों के साथ जाजल हेंवलघाटी टिहरी पहुची थीं। बडियारगढ़ में सुन्दर लाल बहुगुणा ने भूख हड़ताल की। उन्हें देहरादून जेल भेजा दिया गया। यहाँ वन कटान रोकने के आश्वासन के बाद उन्होंने उपवास तोड़ा। पत्रकार साहित्यकार कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर ने उपवास तुड़वाया। मैं वहाँ मौजूद था। इसका ऐतिहासिक चित्र मेरे पास उपलब्ध है, जिसे लेख के साथ दिया जा रहा है। वहां रेखा दी, रंजना दी, रीता दी, कुवर प्रसून, धूमसिंह नेगी, विजय जड़धारी आदि मौजूद थे। इस चित्र और इस विवरण को सुन्दर लाल बहुगुणा की पुत्री मधु पाठक ने अपनी पुस्तक में मेरे नाम से छापा था। चिपको चेतना से तो हमारा परिवार जुड़ा ही हुआ था। चिपको आन्दोलन से भी सीधे जुड़ गए थे। देहरादून में हमारे घर सुभाष रोड में गोष्ठी होती थी। प्रसिद्ध स्वाधीनता संग्राम सेनानी राष्ट्रीय कवि श्रीराम शर्मा प्रेम को बहुगुणा जी मित्रवत गुरुजी कहते थे। इन गोष्ठियों में आंदोलन की रणनीति बनती थी।
आज पर्यावरण गहरे संकट में है। धरती, आकाश, हवा, पानी, पहाड़, नदियाँ आदि संकट से घिरती जा रही हैं। इसलिए जीव-जंतुओं पर भी संकट है। चिपको आन्दोलन की वर्षगांठ पर ज़रा सोचें। अपने विचार उपलब्ध मंचों पर प्रकट करें। पर्यावरणविद् सुरेश भाई ने रक्षा-सूत्र आन्दोलन इस दिशा में आगे बढ़ाया है। उनके नेतृत्व में नदी बचाओ आन्दोलन हुआ। बहुत लोग साथ आये। वहीं मैंने एक जन गीत लिखा था- ‘अब नदियों पर संकट है सारे गांव इकट्ठा हों… अब न कटें पेड़… सारे गांव इकट्ठा हों।’
(लेखक जनकवि नाम से विख्यात हैं।)




