होर्मुज जैसे संकट से निपटने के लिए कदम उठाने होंगे
सड़क परिवहन को डीजल से मुक्ति समय की जरूरत
-गिरीश गुरुरानी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 80वें स्वतंत्रता दिवस पर लालकिले की प्राचीर से ऐलान किया, ‘भारतीय रेल का सौ फीसदी नेटवर्क अब बिजली से चलने लगा है’। मतलब, भारत ऐसा करने वाला स्विटजरलैंड के बाद दुनिया का दूसरा देश बन गया और बड़े रेल नेटवर्क वाले देशों चीन और रूस को काफी पीछे छोड़ चुका। अमेरिका में अभी इस दिशा में शुरूआत भर हुई है। देश में ब्राडगेज रेलवे का संपूर्ण विद्युतीकरण स्वाभाविक रूप से पर्यावरण संरक्षण की ओर भी महत्वपूर्ण कदम है। एक अनुमान के अनुसार रेल नेटवर्क को डीजल के मुकाबले बिजली से चलाने पर खर्च करीब आधा रह जाता है। डीजल की मांग घटने से विदेशी मुद्रा बचेगी। सबसे बड़ी बात यह कि भारतीय रेलवे को अब किसी अंतर्राष्ट्रीय उथल-पुथल के कारण ईंधन आपूर्ति की अनिश्चितता से आजादी मिल गई। कुल जरूरत का 88 प्रतिशत कच्चा तेल जिस देश में आयात होता हो, वहां आम से लेकर खास आदमी के सफर का सबसे बड़ा भरोसेमंद साधन रेल अब ईंधन के लिए किसी दूसरे देश पर निर्भर नहीं।
‘होर्मुज की जंग’ पता नहीं कब तक खिंचेगी? तेल से भरे जहाजों को गुजारने वाला यह संकरा किंतु महत्वपूर्ण समुद्री रास्ता पता नहीं कब खुले, कब बंद हो जाए? बाकी दुनिया के साथ भारत के सामने भी इस अनिश्चितता को लेकर जुड़ी ईंधन संकट की गंभीर चिंताएं समान रूप से हैं। दुनिया हार्मुज और ईंधन दोनों के विकल्पों पर विचार कर रही है। लाल सागर के जरिये तेल आपूर्ति बढ़ाई जा रही है, लेकिन इजराइल समेत पश्चिमी देशों के विरोधी और ईरान समर्थक हूती विद्रोपियों का क्या करेंगे? वे लाल सागर से निकलने वाले जहाजों को निशाना बनाकर सुर्खियां समेट रहे हैं। तेल आपूर्ति के दोनों रास्तों पर संकट के बादल छाए हुए हैं। अमेरिका की निरंतर बदलती रणनीति से संकेत मिलते हैं कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम का मुद्दा पीछे छूट चुका है, फिलहाल असल लड़ाई होर्मुज जलडमरू मध्य पर कब्जे को लेकर छिड़ी दिख रही है। ईरान के लिए यह जीने-मरने का सवाल है। ऐसे में अमेरिका और ईरान के बीच समझौते के आश्वासन भी स्थाई समाधान की गारंटी नहीं दे पा रहे। लिहाजा होर्मुज की आग आसानी से बुझती नहीं दिख रही। इस स्थिति में भारत को बिना देरी के तेल की आपूर्ति से जुड़े संकट का असर कम करने के लिए युद्ध स्तर पर घरेलू उपाय करने होंगे।
चीन जैसी चाल चाहिए
रेलवे की तरह अब सड़क परिवहन के क्षेत्र में ‘रफ्तार’ दिखाने का वक्त आ गया है। सार्वजनिक परिवहन सेवाओं में शामिल वाहनों को इलेक्ट्रिक बेड़े में बदलने की गति तेज करनी होगी। केंद्र और राज्य सरकारों को अगले पांच-छह साल में राज्य परिवहन निगमों की बसों, निजी बसों और माल वाहक ट्रकों को इलेक्ट्रिक ह्वीकल (ईवी) में बदलने के लिए मिशन मोड पर काम करना होगा। इससे हमारी सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था और माल ढुलाई हार्मुज जैसे किसी संकट से बेअसर रहेगी और यातायात के लिए दूसरे देशों पर निर्भरता खत्म होगी। तेल पर खर्च होने वाली विदेशी मुद्रा की बचत होगी। भारत यह कारनामा रेलवे में कर सकता है तो फिर सड़क परिवहन में क्यों नहीं? जैसा कि प्रधानमंत्री ने लालकिले से कहा- ‘जो काम पिछले पांच-सात दसक में नहीं हुए, उन्हें पांच-सात साल में करना होगा’। इस अवधि में देश में हरित और उत्सर्जन मुक्त सार्वजनिक यातायात व्यवस्था बनाई जा सकती है। शुरूआत हो चुकी है। केंद्र सरकार सार्वजनिक यातायात के लिए संचालित बसों और भार-वाहक ट्रकों पर सब्सिडी दे रही है। राज्य सरकारें अपने स्तर पर अलग से वाहन पंजीकरण में छूट देकर ई-ह्वीकल को बढ़ावा दे रही हैं। दिल्ली, गोवा, महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात जैसे राज्यों के नगरीय बस बेड़े में 8 से 50 फीसदी तक ई-बसें शामिल हो चुकी हैं। पहाड़ी राज्यों में हिमाचल हाल ही में 297 नई ई-बसों को अपने बेड़े में मिलाने के बाद करीब 13 फीसदी की ऊंचाई पर पहुंच गया। पहाड़ों पर लंबी दूरी और आधारभूत सुविधाएं विकसित करना कठिन है। ऐसे में हिमाचल परिवहन की सभी बसों को ग्रीन बस में बदलने और ग्रीन कारिडोर रूट्स पर हर 50 किलोमीटर में चार्जिंग स्टेशन बनाने का फैसला लिया जाना महत्वपूर्ण है। इनमें लाहौल स्पीति का वह जिंगजिंगबार नामक जगह भी शामिल है, जहां अभी पैट्रोल पंप तक नहीं है।
कुल बस बेड़े में ईवी का हिस्सा देखें तो हम संसार के दस शीर्ष देशों में शुमार हैं। अन्तर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी और कुछ वैश्विक रिपोर्टों के अनुसार चीन कुल बस बेड़े में 35 फीसदी ईवी हिस्सेदारी से साथ टाप पर है। शेन्ज़ेन समेत उसके कुछ शहरों ने सौ फीसदी का लक्ष्य हासिल कर लिया है। नीदरलैंड 30 फीसदी ईवी बसों के साथ यूरोप का अग्रदूत बन गया है। इस देश ने 2030 तक सभी सार्वजनिक बसों को 100 प्रतिशत शून्य-उत्सर्जन बनाने का कानूनी लक्ष्य तय किया है। भारत में ईवी बस का आंकड़ा कुल बेड़े के मुकाबले अभी सात प्रतिशत के आस-पास है, लेकिन हाल के वर्षों में तेजी से वृद्धि दर्ज की जा रही है। जानकार मानते हैं कि अगर सारे सार्वजनिक परिवहन को इलेक्ट्रिक में परिवर्तित कर दिया जाए तो मौजूदा मांग से अधिकतम पांच फीसदी अतिरिक्त बिजली की आवश्यकता होगी। बड़े लक्ष्य के सामने यह जरूरत साधारण है। इससे डीजल की मांग में भारी कमी आएगी। बसों और अन्य वाहनों की शुरूआती लागत भलेही ज्यादा हो, लेकिन उनकी प्रति किलोमीटर परिचालन लागत काफी कम हो जाती है।
चार्जिंग स्टेशन की चुनौती
सबसे बड़ी चुनौती चार्जिंग स्टेशन स्थापित करना है। तेजी से चार्जिंग स्टेशन स्थापित करने के लिए ग्रामीण सड़कों से लेकर एक्सप्रेस-वे तक सभी जगह स्थानीय युवाओं और बेरोजगारों के लिए आकर्षक प्रोत्साहन योजना तैयार करनी होगी, जिससे उनके सामने धन की कमी आड़े नहीं आए। मैदानों में हर 100 किलोमीटर और पर्वतीय क्षेत्र में हर 50 किलोमीटर पर चार्जिंग स्टेशन खोलने की योजना बनानी होगी। तभी तय समय पर लक्ष्य तक पहुंचा जा सकता है। स्थानीय बेरोजगारों के लिए भूमि की उपलब्धता एक समस्या हो सकती है। इसे दूर करने के लिए सड़क किनारे की निजी भूमि के स्वामियों अथवा उसे लीज पर लेने वालों को चार्जिंग स्टेशन बनाने की इजाजत दी जा सकती है। जहां लंबी दूरी तक केवल सरकारी भूमि हो, वहां यदि पेड़ काटे बिना चार्जिंग स्टेशन बनाना संभव हो तो स्थानीय लोगों को पर्यावरण की कड़ी शर्तों के साथ सरकारी भूमि लीज देने का प्रावधान हो सकता है। दूसरा, पर्यावरण संरक्षण का वास्तविक लक्ष्य तभी पूरा होगा, जब चार्जिंग में खपने वाली अतिरिक्त बिजली थर्मल या कोयले के बजाय सौर ऊर्जा से पैदा की जाए।
यह नया लक्ष्य रेलवे को विद्युतीकृत करने जैसा सरल नहीं होगा। रेलवे संपूर्ण सरकारी उपक्रम होने के कारण कहीं कोई बाधा नहीं आई। बसों और ट्रकों के बेड़े में सरकारी के अलावा निजी भागीदारी है। प्राइवेट बस और ट्रक आपरेटर यह कह कर ऐतराज कर सकते हैं कि वे महंगे इलेक्ट्रिक वाहन नहीं खरीद सकते या फिर एक कर्ज से मुक्त हो चुका वाहन उन्हें कमाई करके दे रहा है। ऐसे में ऋण लेकर वे नया वाहन क्यो लें? ऐसे कारोबारियों के लिए पुराने के बदले नए ईवी वाहन की तुलनात्मक रूप से लाभकारी स्कीम देनी होगी। योजना आकर्षक होने पर बदलाव आसान हो जाएगा। राज्यों के स्तर पर केंद्र की मदद से सरकारी परिवहन निगम की सभी बसों को ईवी में बदलने में कोई बाधा नहीं है। उन्हें आसानी से पांच साल में ग्रीन ट्रांसपोर्ट में तब्दील किया जा सकता है। जरूरत सिर्फ एक नए संकल्प की है।




