पेपर लीक रोकने की गारंटी क्यों नहीं देती सरकार?
पेपर लीक इस समय सबसे बड़ा मुद्दा बन चुका है। देश के लाखों युवा खुद को इस समस्या से घिरा महसूस कर रहे हैं। मौजूदा परीक्षा प्रणाली से उनका भरोसा उठ चुका है। बहुत महंगी पढ़ाई, ट्यूशन का भारी खर्च, कैरिअर के लिए परीक्षाओं की दिन-रात की तैयारी का तनाव और आखिर में प्रतियोगी परीक्षा का पेपर लीक। बार बार यही होता देख युवाओं में निराशा घर कर चुकी है। दिल्ली समेत कई शहरों में नौजवान सड़क पर हैं। वर्षों से चली आ रही इस बीमारी का क्या कोई इलाज नहीं है? क्या पेपर लीक को रोका नहीं जा सकता? यदि रोका जा सकता है तो फिर सरकार क्यों नहीं रोक पा रही? तरह-तरह की गारंटी देने वाली सरकार युवाओं को पेपर लीक रोकने की गारंटी क्यों नहीं देती? अब तक का अनुभव बताता है कि सरकार इसका समाधान केवल कानून में देख पा रही है। उसे कड़ा कर देने या सजा बढ़ा देने से बीमारी खत्म होने की उम्मीद की गई। कानून में सजा बढ़ा दी गई, परंतु समाधान नहीं हो सका।
नकल रोकने के लिए केंद्र सरकार ने फरवरी 2024 में जो कानून बनाया, वह एक तरह से फेल हो गया। सजा के लिहाज से देखें तो केंद्र से अधिक कड़ा उत्तराखंड का नकल विरोधी कानून दिखाई देता है। इसमें पेपर लीक कराने वाले गिरोह के लिए आजीवन कारावास तक का प्रावधान है। लेकिन पेपर लीक करवाने वालों ने इसकी भी धज्जियां उड़ा दीं। नए कानून के बाद उत्तराखंड अधीनस्थ कर्मचारी चयन आयोग की परीक्षा का पर्चा लीक हो गया। शुरूआत में आयोग ने इसे पर्चा लीक मानने से ही इनकार कर दिया। आयोग के बाद सख्त कानून बनाने का दावा करने वाली राज्य सरकार ने हैरान करने वाला बयान दिया- ‘पेपर लीक नहीं हुआ है, तीन पन्ने बाहर आए हैं।’ अब यह तो सरकार ही जाने कि परीक्षा के बीच में तीन पन्ने परीक्षा कक्ष से बाहर आने और पेपर लीक होने में अंतर क्या है? पानी सिर से ऊपर जाने लगा, तब जाकर सरकार ने पेपर लीक माना और मुकदमा शुरू हुआ। इस मामले की सीबीआई जांच की मांग भी पहले नहीं मानी गई। देहरादून में बेरोजगारों के आंदोलन की बढ़ती ताकत ने सरकार की नाक में दम कर दिया, तब जाकर सीबीआई जांच की संस्तुति की गई। ऐसा ही दिल्ली में भी हुआ। पहले केंद्र सरकार ने जंतर मंतर के आंदोलन की अनदेखी की। बीस जुलाई को दिल्ली में उमड़ी प्रदर्शनकारियों की भारी भीड़ के दबाव में सरकार ने आनन-फानन में सीजेपी के नेताओं को बातचीत के लिए बुलाया। जाहिर है सरकारें आसानी से गलती मानने या फिर उसमें सुधार के लिए तैयार नहीं हैं। सत्ता अपने बनाए कानून पर इतराती रहती है। ध्यान रहे, कोई भी कानून अपराध होने के बाद काम आता है, उपाय यह करना होगा कि अपराध ही न होने सके। इसके लिए तकनीक का उपयोग और सीधी प्रशासनिक जवाबदेही तय करने की जरूरत है।
कुछ प्रारंभिक सुझाव-
1. जहां तक संभव हो हर परीक्षा कंप्यूटर पर करवाई जाए। पेपर के कई सेट तैयार हों, अंतिम समय में कोई एक पेपर जारी करने का अधिकार जिन लोगों के हाथ में हो उनकी सम्पूर्ण जवाबदेही सुनिश्चित की जाए।
2. स्क्रीन पर पहले सवाल का जवाब देने के बाद ही दूसरा सवाल दिखे। हालांकि इसमें परीक्षार्थी के पास किसी सवाल का उत्तर बदलने का विकल्प नहीं रहेगा और न ही आसान सवाल पहले हल करने की सुविधा। लेकिन पेपर लीक होने की संभावना लगभग समाप्त हो जाएगी।
3. यदि ऊपर दिया तरीका छात्रों के लिए असुविधाजनक माना जाए तो विकल्प के रूप में 10-10 प्रश्नों के सेक्शन बने हों। पहले 10 प्रश्न सबमिट करने के बाद ही अगले 10 प्रश्न स्क्रीन पर आएं।
4. निजी संस्थानों और कोचिंग सेंटरों को परीक्षा प्रणाली से पूरी तरह बाहर कर दिया जाए। ऐसे कई सेंटर अपनी सफलता दूसरे से ज्यादा दिखाने के लिए पेपर लीक का हिस्सा बनने से संकोच नहीं करते।
(ऊपर दिए गए सुझाव उदाहरण के रूप में हैं, परीक्षा प्रणाली में सुधार प्रक्रिया को शिक्षा और तकनीकी क्षेत्र के जाने-माने विशेषज्ञों और छात्रों की सलाह के बाद ही अंतिम रूप दिया जाना चाहिए।)
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और इसका जवाब कौन देगा?
देश की राजधानी में प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कई मुकदमे दर्ज कर लिए गए हैं, लेकिन जिन्होंने छात्रों और बेरोजगारों के सिर फोड़े क्या उन पर भी मुकदमे होंगे? प्रदर्शन के दौरान बिना नाम पट्टी वाली वर्दी, चेहरे पर दाड़ी के साथ कानों में बाली पहने पुलिस वालों के फोटो सोशल मीडिया पर देखे गए। यह दिल्ली पुलिस को बदनाम करने की कोई ‘एआई साजिश’ थी या फिर पुलिस वालों को नए रूप-रंग में उतरने की छूट दे दी गई है? इसका जवाब दिल्ली के पुलिस कमिश्नर ही दे सकते हैं।




