मोदी के स्वागत को 21 हजार बच्चे ‘ड्यूटी’ पर
जननायक की छवि को लेकर क्या जाएगा संदेश
देहरादून। क्या सरकारी मशीनरी को ऐसे कोई संकेत मिले थे कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रोड शो में शामिल होने के लिए लोग रुचि कम दिखा रहे हैं? ऐसा नहीं है तो फिर रोड शो की सफलता के लिए एक-एक स्कूल, कालेज और विश्वविद्यालय की सूची बनाकर वहां से कुल करीब 21 हजार छात्रों को लाने की योजना बनाने की क्या जरूरत पड़ गई? योजना यदि इसी रूप में लागू होती है तो क्या यह सरकारी कसरत मोदी की जननायक वाली छवि के अनुकूल होगी?
मोदी जौलीग्रांट पहुंच चुके हैं। थोड़ी देर में दिल्ली-दून एक्सप्रेस वे का उदघाटन करने वाले हैं। आशारोड़ी से आरआईएससी गेट तक कई किलोमीटर लंबा रोड शो करेंगे। इस रोड शो की सफलता के लिए 21 हजार से अधिक छात्र छात्राओं को सड़क के किनारे तैनात किया जा रहा है। बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर जयंती की छुट्टी (कुछ स्कूलों के आज भी खुलने की सूचना है) के बावजूद स्कूल, कालेज और विश्वविद्यालयों के छात्रों को सड़क के दोनों किनारे खड़ा किया जा रहा है। इसमें सरकारी, अर्धसरकारी और प्राइवेट सभी शिक्षण संस्थान शामिल हैं। कार्यक्रम को भव्य दिखाने के लिए ऐसा किया जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग के दिशा निर्देश बच्चों को भीड़ के रूप में इस्तेमाल करने से रोकते हैं। हालांकि सरकारी तंत्र ने बच्चों को भीड़ के रूप में इस्तेमाल करने के नियमों से बचने के लिए नायाब तरीका जरूर निकाला है।
देहरादून शहर छोड़िए, सहसपुर से लेकर थानो-भोगपुर तक के स्कूलों, कालेजों और विश्वविद्यालयों के 21035 छात्रों को प्रधानमंत्री के रोड शो को सफल बनाने के लिए लाया जा रहा है। ज्यादातर शिक्षण संस्थान अपनी बस से छात्रों को ला रहे हैं। भीड़ सुनिश्चित करने और निगरानी के लिए सुपर जोनल अधिकारी, जोनल अधिकारी और सेक्टर अधिकारी तैनात किए गए हैं। 16 पेज के प्लान में इनके अलावा संस्थानों के नाम, छात्र संख्या, बस की व्यवस्था और तैनाती स्थल का उल्लेख है, लेकिन इस पर किसी के हस्ताक्षर नहीं हैं। अगर किसी ने सवाल उठाया तो प्रशासन तुरंत हाथ झाड़ लेगा और कहा जा सकेगा कि छात्र खुद आए या फिर स्कूल स्वेच्छा से उन्हें लेकर आए थे।
अदालतों और राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग ने स्कूली बच्चों को भीड़ के रूप में इस्तेमाल करने को शिक्षा के अधिकार और बाल अधिकार का उल्लंघन माना गया है। कैलाश सत्यार्थी के संगठन की जनहित याचिका में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि स्कूल के समय बच्चों को किसी गैर शैक्षणिक गतिविधि में शामिल करना उनके मौलिक अधिकारों का हनन है। यहां इस बात पर बहस हो सकती है कि आज छुट्टी का दिन होने के कारण यह बच्चों के स्कूल का समय गिना जाएगा या नहीं? यदि स्कूल का समय नहीं भी गिना जाएगा तो क्या किसी सरकारी कार्यक्रम को सफल बनाने की जिम्मेदारी स्कूल-कालेज के बच्चों की है? उन्हें छुट्टी और पढ़ाई छोड़कर आना पड़ेगा। आने वाली तीन मई को नीट की परीक्षा है। एक छात्र नीट की परीक्षा पास करने के लिए हर दिन कितने घंटे संघर्ष करता है? उसका एक एक मिनट बेहद महत्वपूर्ण है। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्रों का एक दिन छोड़िए, एक घंटे की कीमत केवल उनके अभिभावक ही समझ सकते हैं। वे राजनेता नहीं समझ सकते, जिन्हें अपनी छवि चमकाने और भीड़ दिखाने के लिए बच्चों को भी इस्तेमाल करने से गुरेज नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र और राज्य सरकारों को उन गाइड लाइन्स को भी सख्ती से लागू करने को कहा है, जो स्कूल प्रबंधन को बच्चों की सुरक्षा और उनके समय के सदुपयोग के लिए जिम्मेदार ठहराती हैं। यह भी देखना होगा कि इसे किशोर न्याय अधिनियम का उल्लंघन माना जाएगा या नहीं?
कानूनी पहलू छोड़िये, नैतिक रूप से यह कितना सही है कि एक बच्चे को तपती धूप में किसी सड़क के उदघाटन और रोड शो के लिए सड़क के किनारे घंटों खड़ा कर दिया जाए। यह कोई शैक्षणिक कार्यक्रम भी नहीं कि बच्चा उससे कुछ सीखे। दूसरा, दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी का दावा करने वाली भाजपा और डबल इंजन की सरकार को ये दिन देखने पड़ रहे हैं कि उसे देश के सबसे बड़े नेता के रोड शो को सफल बनाने के लिए बच्चों पर निर्भर रहना पड़ रहा है? महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि क्या पूर्व की सरकारों के दौर में बच्चों का भीड़ के तौर पर इस्तेमाल नहीं होता था? बिल्कुल हुआ है, कांग्रेस के समय भी हुआ था। हां, पैमाना इतना बड़ा नहीं रहता था। कांग्रेस ने अपने ऐसे ही तमाम कर्म भुगते और वह नौ साल से उत्तराखंड में सत्ता से बाहर है। एक और बड़ी बात है, ऐसा करना मोदी की जननायक वाली छवि को ध्वस्त नहीं करता? माना जाता है कि मोदी के लिए लोग खिंचे चले आते हैं। जहां मोदी के नाम पर जमा होने वाली हजारों की भीड़ खड़ी होनी चाहिए, वहां स्कूली बच्चों को देख क्या संदेश जाएगा? यही न कि उनका नाम भी भीड़ जुटाने के लिए संघर्ष कर रहा है?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी परीक्षा पर चर्चा करके छात्रों को मार्गदर्शन देते हैं। किसी और को पता हो न हो छात्रों के समय की कीमत उन्हें जरूर मालूम होगी। उनसे आग्रह है कि आज के इस आयोजन के लिए सरकारी मशीनरी को माफ कर दें और स्कूल, कालेज और विश्वविद्यालयों के छात्रों को भीड़ के रूप में इस्तेमाल करने और उनको उनके स्कूल या कालेज परिसर से बाहर किसी गैर-शैक्षणिक कार्य के लिए ले जाने पर सख्त कानूनी पाबंदी लगा दें। कड़ी सजा जरूर जोड़ दीजिएगा।



