ग्रीष्म के तपते तरुवर,
सावन का सपना लेकर,
अपने को जीवित रखते हैं।
पर यह सावन सह्रदय नहीं,
यह रिमझिम चिर साथ नहीं।
हरियाली से बहलाता,
निर्दय उन्हें..
पतझड़ पर पहुंचाता।
कोई कह दे इस सावन से,
अब बहलाना बंद करे।
अब तक तो ये उपवन,
मन ही मन..
यह सब कुछ सहते रहते हैं।
ग्रीष्म के तपते तरुवर,
सावन का सपना लेकर, अपने को जीवित रखते हैं।
-गिरीश गुरुरानी




