उत्तराखंड में कृषि क्षेत्र की उपेक्षा बेहद चिंताजनक है। खेती का क्षेत्रफल का लगातार घट रहा है। पहाड़ों से पलायन इसका एक कारण है। सिंचाई के साधनों की कमी और आधुनिक तकनीक का पूरा इस्तेमाल नहीं होने से खेती अलाभकारी साबित हो रही है। मुफ्त अनाज योजना के कारण भी कुछ लोगों ने कठिन परिश्रम से मुंह मोड़ लिया है। सरकार कई योजनाओं के बावजूद छोटे किसानों को परंपरागत खेती में बड़े बदलाव के लिए तैयार नहीं कर पाई है।
उत्तराखंड ने राज्य के रूप में 25 साल पूरे कर लिए हैं। लेकिन खेती जैसे बुनियादी क्षेत्र को लेकर गंभीरता नहीं दिख रही है। राज्य बनने के बाद इन 25 वर्षों में हमने खेती का दो लाख हेक्टेयर से ज्यादा क्षेत्र खो दिया है। तब 7.70 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में खेती हो रही थी, अब वर्ष 2024-25 में यह आंकड़ा 5.68 लाख हेक्टेयर तक सिमट गया है। राज्य गठन के बाद से अब तक करीब 27% भूमि पर खेती बंद चुकी है। इस तरह औसतन 3,500 से 4,000 हेक्टेयर कृषि भूमि हर साल घट रही है। रोजगार के साधनों की कमी के बावजूद लोग खेती क्यों छोड़ रहे हैं? यह गंभीर सवाल है।
यह सही है कि शहरीकरण और व्यवसायीकरण के तेज होने से आवासीय कॉलोनियां और औद्योगिक इकाइयां बनने के कारण कृषि भूमि कंक्रीट के जंगलों में बदल रही है। विकास की दृष्टि से इसे जरूरी माना जा सकता है, लेकिन अंधाधुंध तरीके से निर्माण खेती की जमीन को तेजी से निगल देगा। इसके लिए समय रहते सचेत होकर उचित नियोजन करना होगा। भूमि के उचित प्रबंधन के लिए इसे कृषि, आवासीय, उद्योग और निर्माण के लिए कड़ाई से चिन्हित करना होगा। कुछ स्थानों पर अनावश्यक कंक्रीट की कोठियां खड़ी की जा रही हैं। जैसे ऋषिकेश से टिहरी और हल्द्वानी से मुक्तेश्वर मार्ग पर आपको कई बड़ी बड़ी कोठियां नजर आएंगी, लेकिन उनमें कई में साल के ग्यारह महीने कोई नहीं रहता। सर्वेंट क्वाटर में केवल स्थानीय नौकर रहते हैं। इन कोठियों की जगह पहले सेब-नाशपाती के खूबसूरत बगीचे होते थे। आलू, मटर अथवा अन्य फसलों का उत्पादन होता था। इन कोठियों के मालिकों को देश भर में संपत्ति खरीदने का कानूनी अधिकार है। उनको गलत नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन हमें इसे रोकने के लिए व्यवस्था बनाने से कौन रोक रहा है? हिमाचल के भू-कानून का बार बार उल्लेख इसलिए होता है। हिमाचल ने दसकों पहले एक तर्कसंगत कानून (हिमाचल भू-कानून की धारा 118) बनाकर इस तरह खेती की जमीन बर्बाद करने पर रोक लगा दी थी।
कानून उत्तराखंड में भी है। प्रदेश से बाहर के एक परिवार को अधिकतम 250 वर्ग मीटर भूमि आवासीय उद्देश्य से खरीदने की इजाजत दी गई है। जब भूमि खरीदने का उद्देश्य आवासीय था तो फिर वहां कोई रहता क्यों नहीं? यह कौन पूछेगा? इसके अलावा भी इस कानून की कई कमजोरियां हैं। 250 मीटर की सीमा पूरे परिवार के लिए है, लेकिन लोगों ने एक ही परिवार के कई लोगों के नाम पर जमीनें खरीद ली हैं। ऐसी जमीनों के अलावा उद्योग लगाने के नाम पर आवंटित जमीनों का सालाना मुआयने की व्यवस्था करना आवश्यक है, जिससे यह पता चल सके कि जमीन का उपयोग सही हो रहा है। आवासीय भूमि पर पर तीन साल में घर नहीं बनाने या फिर बनाकर खाली रखने की भी निगरानी आवश्यक है।
उत्तराखंड में जंगली जानवरों सुअर और बंदर के आतंक और शिक्षा-चिकित्सा जैसी जरूरी सुविधाओं की कमी के कारण लोग गांव के साथ खेती भी छोड़ रहे हैं, जिससे भूमि बंजर होती चली जा रही है। खासकर पहाड़ों पर परंपरागत खेती महंगाई के दौर में अलाभकारी हो चुकी है। मजदूरी करके खाद्यान्न खरीदना बेहतर विकल्प बन रहा है। अलाभकारी इसलिए भी कि पहाड़ों पर ज्यादातर जमीन असिंचित है। बारिश होगी तो खेती होगी, वरना नहीं। इस साल का उदाहरण लें, रवि भी बुआई का सीजन निकल गया, परंतु अभी तक बारिश नहीं होने के कारण किसान बुआई नहीं कर पाए हैं। पहाड़ पर अगर मजदूर लगाकर खेती की जाए तो लगभग 20 हजार रुपये की लागत में औसतन 16 हजार का गेहूं पैदा होता है। अगर गेहूं की जगह सरसों बोएं तो फिर लागत निकलने के बाद कुछ लाभ भी हो सकता है। हां, सरसों बेचने के बजाय उसका तेल निकालकर बेचने पर खेती लाभकारी साबित हो जाएगी। इसी तरह हल्दी, अदरक, सुंगंध पौध आदि विकल्प हो सकते हैं। कई योजनाएं होने के बावजूद हमारा सरकारी सिस्टम परंपरागत खेती में न तो बदलाव के लिए किसान को तैयार कर पाया और न ही हल-बैल की जगह आधुनिक पावर टिल्लर और नए उपरकणों का इस्तेमाल सिखा पाया। किसानों को प्रशिक्षित करके कुछ गांवों में सामूहिक खेती का प्रयोग शुरु किया जा सकता है।
कृषि योग्य भूमि के क्षेत्रफल में उत्तराखंड ही नहीं, पूरे देश में कमी आ रही है। हालांकि देश में दो दशक में पांच प्रतिशत के आसपास खेती की जमीन कम हुई, लेकिन उत्तराखंड में 25 साल में 27 फीसदी कृषि भूमि सिकुड़ गई। इसका मुख्य कारण बढ़ता शहरीकरण, औद्योगिक विकास और कृषि भूमि का गैर-कृषि कार्यों जैसे मकान और सड़कें आदि बनाने के लिए उपयोग होना है। देश में जहां कृषि भूमि का कम होना मुख्य रूप से शहरीकरण से जुड़ा है, वहीं उत्तराखंड में इसके अलावा फसलों का अलाभकारी होना, मानव-वन्यजीन संघर्ष, पलायन और आपदा आदि कारण भी जिम्मेदार हैं।
खेती के क्षेत्रफल में पिछले पांच वर्षों में अधिक तेजी से कमी आई है। इसका कारण अलाभकारी खेती, पलायन के अलावा पांच किलोग्राम मुफ्त अनाज की योजना भी है। यह हमारी जटिल मानसिकता है कि जब किसी को बिना मेहनत घर बैठे मुफ्त राशन मिल जाएगा तो वह खेतों में पसीना क्यों बहाएगा? जिस तेजी से कृषि क्षेत्र घट रहा है, उससे राज्य की जीडीपी में प्राथमिक क्षेत्र का योगदान भी लगातार कम होता चला जाएगा। किसान, कृषि वैज्ञानिकों और सरकार को मिलकर इस समस्या के समाधान का रास्ता बनाना होगा।
एक दिलचस्प तथ्य है कि जमीन कम होने के बावजूद भारत का खाद्यान्न उत्पादन रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच रहा है। इसके पीछे तीन मुख्य कारण हैं:
- फसल गहनता:अब किसान एक ही जमीन पर साल में दो या तीन फसलें ले रहे हैं।
- उन्नत तकनीक:हाइब्रिड बीजों और आधुनिक खाद के उपयोग से प्रति हेक्टेयर पैदावार बढ़ गई है।
- सिंचाई का विस्तार:सिंचाई सुविधाओं के बढ़ने से अब वह जमीन भी उपजाऊ हो गई है जो पहले बारिश पर निर्भर या बंजर थी।




