उस सुबह 8.15 बजे हम पोरबंदर के ऐतिहासिक घर के भीतर दाखिल हो चुके थे। तीन मंजिला इमारत के भूतल का कक्ष, जिसे देखने की लालसा लंबे अरसे से मन में हिलोरे मार रही थी। हम दोनों उसी कमरे में श्रद्धांजलि की मुद्रा में खड़े थे। कमरे के खास हिस्से की लकड़ी के जंगले से घेराबंदी करके वहां स्वास्तिक का निशान बनाया गया है। स्वास्तिक वाले स्थान पर ही मोहनदास करमचंद गांधी ने 2 अक्तूबर 1869 को जन्म लिया था।
मेरी पत्नी माया और मैंने उस कक्ष के अलावा परिसर के कई फोटो और वीडियो मोबाइल में कैद कर लिए। यह इमारत संरक्षित श्रेणी में शामिल है। लेकिन फोटो बनाने पर पाबंदी नहीं है। परिसर को कीर्ति मंदिर नाम से जाना जाता है। सुरक्षाकर्मी निमेश ने हमें बताया कि कस्तूरबा गांधी का पैतृक घर और जन्म स्थान पास में ही दो-तीन घर छोड़कर है। इसके बाद हम कस्तूरबा गांधी का पैतृक घर देखने गए।
कीर्तिमंदिर की सुरक्षा और रखरखाव में लगाए गए लोग बेहद शालीन हैं। रघुपति राघव राजा राम ….. की धुन के बीच ज्यादातर लोग मौन सेवा करते दिखे। थोड़ी देर की मुलाकात और काम में व्यस्त लोगों से कम संवाद के बावजूद उनके व्यवहार ने प्रभावित किया।

परिसर के बाहर मिलीं सफाई कर्मचारी मंजुला कहती हैं- गांधीजी के जन्म स्थान को देखने के लिए दुनिया के लोग आते हैं, अच्छा लगता है। कीर्तिमंदिर से कुछ दूरी पर एक छोटी कार पार्किंग है। दूसरे छोर पर जीरा (स्थानीय उत्पाद), मसाले और खाने-पीने के सामान की दुकान सजाए जिग्नेश ने अपना अनुभव बताते हुए कहा- बापू का जन्म स्थान देखने सबसे ज्यादा केरल और महाराष्ट्र के पर्यटक आते हैं। मैंने मोबाइल की स्क्रीन पर नजर डाली, नौ बज चुके थे। हम पोरबंदर से विदा लेकर द्वारका की तरफ बढ़ने के लिए कार में सवार हो गए।

सफर के दौरान हम काफी देर तक उस हस्ती की चर्चा करते रहे, जिस साधन सम्पन्न बैरिस्टर ने देश की आजादी के लिए अपना सुख और सर्वस्व त्याग दिया। जो न केवल आजादी के आंदोलन का नायक था बल्कि स्वावलंबन, ग्राम स्वराज, अहिंसा, सामाजिक सदभाव, धार्मिक सहिष्णुता, एकता और आपसी भाईचारे की राह दिखाने वाला महानतम व्यक्तित्व था। इसीलिए उन्हें महात्मा की उपाधि दी गई। मोहन दास करमचंद गांधी समुद्रतटीय कस्बे पोरबंदर में जन्मे थे। उनका ह्दय समुद्र की तरह विशाल था, जिसमें बिना भेदभाव के छोटे-बड़े सभी नदी और नालों के समाने जाने की जगह थी। गांधी हमारे बीच नहीं हैं, उनके विचार और दर्शन तो है।

संसाधनों को लेकर उन्होंने कहा था, “प्रकृति के पास हर व्यक्ति की जरूरत को पूरा करने के लिए पर्याप्त संसाधन हैं, लेकिन किसी एक व्यक्ति के लालच को पूरा करने के लिए नहीं।” सर्वोदय की भावना से परिपूर्ण उनके विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं, जितने स्वतंत्रता आंदोलन के समय थे। सह-अस्तित्व, सामाजिक सद्भाव और सहिष्णुता के लिए गांधी आज भी आदर्श हैं, हमेशा रहेंगे। पुण्य तिथि पर girishgururani.com की विनम्र श्रद्धांजलि।
(लेखक ने पिछले माह पोरबंदर की यात्रा की थी।)





